मंगलवार 19 मई 2026 - 18:03
निफ़ाक़ ख़फ़ी, ज़ाहिर की दीनदारी और बातिन की बग़ावत

मानव इतिहास की सबसे खतरनाक बीमारी वह नहीं है जो शरीर को कमजोर कर दे, बल्कि वह है जो आत्मा को खोखला कर दे। कभी-कभी कुफ़्र स्पष्ट होता है; उसका चेहरा सामने होता है और उसकी पंक्तिबद्धता प्रत्यक्ष होती है, लेकिन निफ़ाक़ एक ऐसा ज़हर है जो ईमान के वस्त्र में छिपकर दिलों, समाजों और आंदोलनों को नष्ट करता है।

लेखक: मौलाना सय्यद अली हाशिम आबिदी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | मानव इतिहास की सबसे खतरनाक बीमारी वह नहीं है जो शरीर को कमजोर कर दे, बल्कि वह है जो आत्मा को खोखला कर दे। कभी-कभी कुफ़्र स्पष्ट होता है; उसका चेहरा सामने होता है और उसकी पंक्तिबद्धता प्रत्यक्ष होती है, लेकिन निफ़ाक़ एक ऐसा ज़हर है जो ईमान के वस्त्र में छिपकर दिलों, समाजों और आंदोलनों को नष्ट करता है।

जैसा कि हज़रत जवादुल-आइम्मा इमाम मुहम्मद तक़ी (अ) ने फरमाया: "لَا تَکُنْ وَلِیّاً لِلَّهِ فِی الْعَلَانِیَةِ عَدُوّاً لَهُ فِی السِّرِّ" अर्थात ऐसा न हो कि तुम खुले में अल्लाह के मित्र बनो और एकांत में उसके शत्रु बन जाओ।

यह पवित्र हदीस केवल एक नैतिक नसीहत नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर का लेखा-जोखा है। आज का मनुष्य इबादत स्थलों में आँसू बहाता है, महफिलों में दीन की बातें करता है, सोशल मीडिया पर धर्मपरायणता के वाक्य लिखता है, लेकिन जब उसे एकांत मिलता है तो उसकी निगाहें, विचार, लेन-देन, व्यापार, राजनीति, ज़बान और चरित्र अल्लाह की अवज्ञा में डूब जाते हैं। यही वह स्थान है जहाँ मनुष्य अपने रब के बजाय अपने नफ़्स, प्रसिद्धि और स्वार्थ से संबंध जोड़ लेता है।

निफ़ाक़ केवल यह नहीं है कि इंसान किसी से झूठा प्रेम दिखाए; असली निफ़ाक़ यह है कि बंदा अल्लाह के सामने वफ़ादारी का दावा करे लेकिन दिल में दुनिया की गुलामी रखे। ज़बान पर अल्लाह का ज़िक्र हो लेकिन फैसले इच्छाओं के अधीन हों। नमाज़, रोज़ा, हज, अज़ादारी, ज़ियारत और इबादत सब मौजूद हों, लेकिन हुक़ूक़ुल  एबाद पामाल हों, रोज़ी हराम से भरी हो, चरित्र झूठ से भरा हो और दिल घमंड से लबालब हो। ऐसा व्यक्ति वास्तव में इबादत नहीं कर रहा होता बल्कि दीन को अपनी व्यक्तित्व की नुमाइश का साधन बना रहा होता है।

आज के दौर में निफ़ाक़ ने नए रूप ले लिए हैं। पहले मुनाफ़िक केवल बैठकों में दोगलापन दिखाता था, अब उसके हाथ में मोबाइल है, उसके पास कैमरा है और उसके सामने सोशल मीडिया की दुनिया है। अब कुछ लोग इबादत भी लोगों को दिखाने के लिए करते हैं, दान भी तस्वीर के साथ देते हैं, रोना भी रिकॉर्ड कराते हैं और दीन को भी प्रसिद्धि के बाज़ार में इस्तेमाल करते हैं। यह वह दौर है जहाँ इख़्लास छिप गया है और दिखावा इबादत बनता जा रहा है।

समाज भी एक अजीब विरोधाभास का शिकार है। लोग धर्मपरायण होने की अपेक्षा धर्मपरायण दिखने से अधिक प्रभावित होते हैं। अतः बहुत से लोग चरित्र-निर्माण के बजाय धार्मिक छवि बनाने में व्यस्त हैं। उन्होंने पोशाक बदल ली, बातचीत बदल ली, उपाधियाँ बढ़ा लीं, लेकिन दिल के अंदर ईर्ष्या, द्वेष, आत्ममुग्धता, दुनियापरस्ती और पाप का प्रेम बाकी रहा। यही वह आंतरिक अंधकार है जिसके बारे में क़ुरआन ने मुनाफ़िक़ीन के लिए कठोरतम यातना की खबर दी है।

पवित्र क़ुरआन में मुनाफ़िक़ीन का ज़िक्र बार-बार इसलिए आया है क्योंकि ये लोग दीन के अंदर रहकर दीन को नुकसान पहुँचाते हैं। काफ़िर का खतरा सामने से आता है, लेकिन मुनाफ़िक का वार भीतर से होता है। वह हक़ की सेना में खड़ा होकर बातिल की सेवा करता है। वह अल्लाह के नाम पर लोगों की भावनाएँ खरीदता है। वह पवित्रताओं के माध्यम से अपनी व्यक्तित्व ऊँचा करता है, लेकिन उसके कर्म अल्लाह के सामने खड़े होते हैं।

गौर करें तो निफ़ाक़ दरअसल मनुष्य के बाहरी और भीतरी विरोधाभास है। निगहबान लोग कहते हैं कि जब दिल अल्लाह से खाली हो जाता है तो इबादत केवल हरकतें बनकर रह जाती है। सजदा बाकी रहता है लेकिन बंदगी समाप्त हो जाती है। ज़िक्र बाकी रहता है लेकिन हुज़ूरे-क़ल्ब चली जाती है। इंसान मस्जिद में होता है लेकिन उसका दिल बाज़ार में भटक रहा होता है। यही आध्यात्मिक मृत्यु है।

आज मनुष्य को सबसे अधिक इस बात की आवश्यकता है कि वह बाहरी धर्मपरायणता के बजाय आंतरिक सत्यनिष्ठा पैदा करे। युवाओं को यह सिखाने की आवश्यकता है कि अल्लाह एकांत का भी पालनहार है। जो व्यक्ति रात के अंधेरे में पाप से बच जाता है, वही वास्तव में मोमिन है। जो व्यक्ति शक्ति, प्रसिद्धि, धन और इच्छा के अवसर पर अल्लाह को याद रखे, वही अल्लाह का सच्चा मित्र है।

इसी प्रकार निफ़ाक़ हर आंदोलन का सबसे बड़ा दुश्मन है। इतिहास गवाह है कि बड़े आंदोलन बाहरी शत्रुओं से कम और आंतरिक मुनाफ़िकों से अधिक नष्ट हुए हैं। जब ज़बानें क्रांति की बात करें लेकिन दिल स्वार्थ के गुलाम हों तो राष्ट्र बिखर जाते हैं। इसलिए प्रत्येक धार्मिक और सामाजिक आंदोलन को सबसे पहले आत्म-लेखाजोखा, इख़्लास और चरित्र के आधार पर स्थापित होना चाहिए।

आज यदि हम वास्तव में इमाम मुहम्मद तक़ी अल-जवाद (अ) के इस कथन को समझ लें तो हमारा जीवन बदल सकता है। हमें लोगों के सामने अच्छा दिखने की अपेक्षा अल्लाह के सामने सच्चा होने की चिंता करनी चाहिए, क्योंकि क़यामत के दिन मनुष्य के भाषण, पोस्ट, नारे और बाहरी पोशाक नहीं, बल्कि उसका भीतरी पक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

अतः आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य अपने दिल में झाँके। यदि एकांत में अल्लाह की याद बाकी है, यदि पाप के अवसर पर दिल काँपता है, यदि किसी का हक़ मारने पर ज़मीर बेचैन होता है, और यदि इबादत प्रसिद्धि के लिए नहीं बल्कि अल्लाह का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए है, तो आशा की जा सकती है कि मनुष्य निफ़ाक़ से सुरक्षित है। लेकिन यदि बाहरी और भीतरी दो अलग दुनियाएँ बन जाएँ, तो समझ लेना चाहिए कि आत्मा खतरे में है।

मोमिन की असली पहचान यह नहीं है कि लोग उसे कितना धर्मपरायण समझते हैं, बल्कि यह है कि अल्लाह उसे कितना सच्चा जानता है।

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